नई दिल्ली। केंद्र सरकार की 3,100 से अधिक डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं और 360 से ज्यादा सार्वजनिक सेवाओं के लिए आधार प्रमाणीकरण अनिवार्य है। लेकिन जो अधिकारी देश की सबसे गरीब नागरिकों से हर योजना के लिए आधार मांगते है, वही अपने सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (CGHS) कार्ड को आधार से लिंक कराने का कड़ा विरोध कर रहे है। दरअसल, CGHS के फायदा उठाने वालों में केंद्र सरकार के मौजूदा और रिटायर्ड कर्मचारी और उनके परिवार के सदस्य, मौजूदा और पूर्व सांसद, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के मौजूदा और रिटायर्ड जज, और दिल्ली में मान्यता प्राप्त पत्रकार शामिल हैं।
PIB ने स्पष्ट किया था कि आधार से योजनाओं को लिंक करने से लक्षित, पारदर्शी और पारसमुक्त (लीक-प्रूफ) वितरण सुनिश्चित होता है, जिससे डुप्लिकेट और अयोग्य लाभार्थियों की पहचान आसान हो जाती है। इसके बावजूद, इस नियम को लागू करने वाले अधिकारी स्वयं इसका पालन नहीं कर रहे हैं। CGHS के तहत मृत पेंशनभोगियों या अपात्र हो चुके आश्रितों को हटाने के लिए कोई वार्षिक वेरिफीकेशन प्रक्रिया संचालित नहीं की जाती। पूर्व सैनिकों की स्वास्थ्य योजना (ECHS) और रेलवे की स्वास्थ्य सेवा में आधार लिंक करना पूरी तरह अनिवार्य कर दिया गया है।
विरोध के बाद वापस लेना पड़ा फैसला
सरकार ने जून 2015 से CGHS के लिए आधार लिंकिंग अनिवार्य करने हेतु कई कार्यालय ज्ञापन जारी किए, लेकिन कर्मचारियों के तीखे विरोध के कारण हर बार इसे वापस लेना पड़ा। जुलाई 2024 में भी सरकार को CGHS लाभार्थी आईडी को ‘आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट आईडी’ (ABHA ID) से जोड़ने के आदेश को अगले आदेश तक स्थगित करने पर मजबूर होना पड़ा परिणामस्वरूप, केंद्र सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए यह व्यवस्था पूरी तरह स्वैच्छिक बना दी गई है, जबकि दूसरी ओर, रोजगार गारंटी योजना के तहत 300 रुपये की न्यूनतम दिहाड़ी पाने वाली गरीब महिलाओं के लिए इसे अनिवार्य रखा गया है।
अधिकारियों का तर्क? सरकारी अधिकारियों का मानना है कि CGHS एक अंशदायी योजना है जिसमें वे खुद पैसे देते हैं, न कि कोई मुफ्त कल्याणकारी योजना, जबकि हकीकत यह है कि CGHS के कुल खर्च का लगभग 90% हिस्सा भारत की संचित निधि से आता है और कर्मचारियों का योगदान एक मामूली हिस्सा होता है। अगर अन्य योजनाओं से तुलना करें तो CGHS का प्रति व्यक्ति खर्च सबसे अधिक है।
