महाराजपुर में 1991 की कथित फर्जी मुठभेड़ के मामले में 35 साल बाद 12 पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज हुआ है। सीबीसीआईडी की जांच में पुलिस की मुठभेड़ की कहानी गलत पाई गई। मामले में 18 पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच हुई थी, जिनमें छह की मौत हो चुकी है।
खबर यूपी के जिला कानपुर की है आरोप है कि मुफ्त में प्लॉट नहीं मिलने पर तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी ने राकेश पाठक और उसके साथियों को पकड़कर फर्जी मुठभेड़ दिखाई थी। पुलिस ने आरोपियों के पास से अवैध हथियार और विस्फोटक बरामद होने का दावा किया था।
राकेश पाठक के भाई देव प्रसाद पाठक ने मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए शासन से शिकायत की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि पुलिस घर से पिता की लाइसेंसी बंदूक और रायफल ले गई थी, जिन्हें मुठभेड़ में इस्तेमाल हुआ दिखाया गया।
सीबीसीआईडी जांच में डीसीएम चालक के बयान से पुलिस की कहानी पर सवाल उठे। चालक के मुताबिक, पुलिस ने रामादेवी चौराहे से लोगों को गाड़ी में बैठाया और नर्वल मोड़ पर ले जाकर मुठभेड़ का रूप दिया।
इन धाराओं में दर्ज हुए थे मुकदमे
तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर की ओर से महाराजपुर थाने में मुकदमा संख्या 275/1991 भारतीय दंड संहिता की धारा 399, 402 और 307 के तहत दर्ज कराया गया था। इसके अलावा मुकदमा संख्या 276/1991 से 287/1991 तक आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4/5 के तहत मुकदमे दर्ज किए गए थे।
इन मामलों की विवेचना तत्कालीन उपनिरीक्षक एवं नर्वल थानाध्यक्ष रमेश बंद नटोने ने की थी। अब सीबीसीआईडी की जांच के बाद 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने से करीब साढ़े तीन दशक पुराने इस मामले ने फिर से तूल पकड़ लिया है।
