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देश के वरिष्ठ नागरिकों का जीवन बेहतर और सुरक्षित हो, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और गंभीर कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों को नोटिस जारी कर वृद्धाश्रमों के निर्माण और वहां बुजुर्गों को मिल रही सुविधाओं पर ताजा स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह भावुक मामला करोड़ों बुजुर्गों की गरिमा और उनके अधिकारों से जुड़ा हुआ है। यह सुनवाई डॉ. अश्विनी कुमार द्वारा 2016 में दाखिल की गई एक जनहित याचिका पर चल रही है, जिसमें हर जिले में वृद्धाश्रमों के निर्माण, पर्याप्त पेंशन और वरिष्ठ नागरिकों के लिए बेहतर स्वास्थ्य व चिकित्सा सेवाओं की मांग की गई है। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को समझा है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता डॉ. अश्विनी कुमार ने खुद पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि वृद्धाश्रमों की स्थापना और बुजुर्गों की देखभाल केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि उनके मानवीय अधिकारों का प्रश्न है। करोड़ों बुजुर्गों के कल्याण से जुड़ा यह अहम मामला वर्षों से लंबित है। हालांकि केंद्र सरकार ने इस मामले को संबंधित उच्च न्यायालयों में स्थानांतरित करने का सुझाव दिया था, लेकिन शीर्ष अदालत ने पहले सभी राज्यों से जमीनी हकीकत का ब्यौरा मांगना उचित समझा।

अदालत ने निर्देश दिया है कि अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी सभी राज्यों के महाधिवक्ता को इस संबंध में औपचारिक संदेश भेजेंगे। सभी राज्यों को महाधिवक्ता द्वारा सूचना प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि राज्यों को यह बताना होगा कि उनके यहां वृद्धाश्रमों की क्या स्थिति है और बुजुर्गों को क्या बुनियादी सुविधाएं मिल रही हैं। अदालत ने अपने पुराने निर्देशों को याद करते हुए राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नाल्सा) और ‘हेल्पएज इंडिया’ जैसी संस्थाओं की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना है। 2016 में जारी आदेशों के तहत यह सुनिश्चित करने को कहा गया था कि बुजुर्गों को कानूनी सहायता और सुरक्षा मिले। शीर्ष अदालत का यह नया कदम देश के बुजुर्गों के जीवन में एक नई उम्मीद की किरण लेकर आया है, ताकि वे अपने बुढ़ापे में सम्मान और सुरक्षा का जीवन जी सकें।

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