कानपुर देहात। जिले में फसल अवशेष (पराली) जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए कृषि विभाग ने सख्त रुख अपनाया है। उप कृषि निदेशक हरिशंकर भार्गव ने किसानों को चेतावनी देते हुए कहा है कि पराली जलाना न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि यह कानूनन दंडनीय अपराध भी है। उन्होंने बताया कि पराली जलाने से मिट्टी का तापमान बढ़ जाता है, जिससे उसकी भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसका सीधा असर खेत की उर्वरता और फसल उत्पादन पर पड़ता है। इसके अलावा, खेतों में आग लगने का खतरा भी बढ़ जाता है, जिससे जान-माल और पशुओं को नुकसान हो सकता है।
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि नियमों के अनुसार पराली जलाने पर किसानों पर जुर्माना लगाया जाएगा। दो एकड़ से कम क्षेत्र में पराली जलाने पर 5,000 रुपये, 2 से 5 एकड़ तक 10,000 रुपये और 5 एकड़ से अधिक क्षेत्र में 30,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा। यह कार्रवाई राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम की धारा 24 एवं 26 के तहत की जाएगी।
कृषि विभाग ने किसानों को पराली प्रबंधन के लिए वैकल्पिक उपाय अपनाने की सलाह दी है। इनमें हैप्पी सीडर, सुपर सीडर जैसे कृषि यंत्रों का उपयोग कर अवशेषों को मिट्टी में मिलाना, यूरिया या डी-कंपोजर का छिड़काव कर जैविक खाद तैयार करना, वर्मी कंपोस्ट बनाना, पशु चारे के रूप में उपयोग करना या गौशालाओं में दान देना शामिल है। इसके अलावा, जिला प्रशासन द्वारा “पराली दो-खाद लो योजना” भी चलाई जा रही है, जिसके तहत दो ट्रॉली पराली देने पर एक ट्रॉली गोबर खाद उपलब्ध कराई जाती है। अधिकारियों ने किसानों से अपील की है कि वे पराली न जलाएं और पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ भूमि की उर्वरता बनाए रखने में सहयोग करें।
