डिजिटल और इंटरनेट के आक्रामक विस्तार के बावजूद रेडियो आज भी केवल जीवित ही नहीं, बल्कि संचार, संवाद और मनोरंजन का एक प्रासंगिक माध्यम बना हुआ है। एक समय था जब ट्रांजिस्टर रेडियो खेतों-खलिहानों से लेकर नदियों में डोलती नावों और दुर्गम पहाड़ों तक जीवन का अभिन्न हिस्सा था। वही दौर रेडियो का स्वर्ण युग माना जाता है।
हालांकि आज रील्स और ऑन-डिमांड कंटेंट के बढ़ते आकर्षण ने रेडियो के सामने अस्तित्व की चुनौती खड़ी कर दी है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या रेडियो आने वाले समय में भी प्रभावी, उपयोगी और प्रासंगिक बना रह पाएगा। विश्व रेडियो दिवस के अवसर पर भारतीय परिदृश्य में इस पर गंभीर विमर्श जरूरी हो जाता है।
समय के साथ रेडियो ने स्वयं को बदला है। अब यह केवल पारंपरिक ट्रांजिस्टर तक सीमित नहीं, बल्कि स्मार्ट स्पीकर, मोबाइल एप और इंटरनेट स्ट्रीमिंग के माध्यम से भी दुनिया के हर कोने में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। कारों में ‘कार रेडियो’ के रूप में इसकी प्रासंगिकता आज भी बरकरार है। भारत में ड्राइविंग के दौरान रेडियो अब भी सबसे भरोसेमंद और लोकप्रिय माध्यम माना जाता है।
रेडियो की मजबूती का एक बड़ा कारण उसकी स्थानीयता है। स्थानीय खबरें, मौसम की जानकारी और क्षेत्रीय भाषाओं में प्रसारित कार्यक्रमों की जो व्यापकता सार्वजनिक रेडियो, विशेषकर आकाशवाणी में देखने को मिलती है, वह न तो टेलीविजन में है और न ही इंटरनेट पर। सस्ते इंटरनेट पैक ने रेडियो के डिजिटल विस्तार में भी अहम भूमिका निभाई है, जिससे यह वैश्विक श्रोताओं तक आसानी से पहुंच बना सकता है।
प्राकृतिक आपदाओं या संकट की स्थितियों में, जब मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट ठप हो जाते हैं, तब रेडियो ही संचार का सबसे विश्वसनीय साधन साबित होता है। इसकी पोर्टेबिलिटी, कम लागत और तकनीकी सरलता इसे विशिष्ट बनाती है। स्थानीय समुदायों से जुड़ाव और आधुनिक तकनीक के साथ तालमेल रेडियो की प्रासंगिकता को और मजबूत करते हैं।
भारत में रेडियो नेटवर्क का दायरा बेहद व्यापक है। देश में लगभग डेढ़ हजार रेडियो स्टेशन हैं, जिनमें सार्वजनिक, निजी और सामुदायिक रेडियो शामिल हैं। जुलाई 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, आकाशवाणी के 585 एफएम और 591 सामान्य स्टेशन कार्यरत हैं। इसके करीब 755 ट्रांसमीटर देश भर में लगे हैं और 231 स्टेशनों पर नियमित कार्यक्रम तैयार किए जाते हैं। आकाशवाणी की पहुंच देश की लगभग 99.2 प्रतिशत आबादी तक है।
इसके अतिरिक्त, 112 शहरों में 388 निजी एफएम स्टेशन सक्रिय हैं और लगभग 500 सामुदायिक रेडियो स्टेशन किसानों, जनजातीय क्षेत्रों और स्थानीय समुदायों की आवाज़ बने हुए हैं।
इतने विशाल नेटवर्क के बावजूद पारंपरिक रेडियो सुनने की आदत में गिरावट आई है, हालांकि एफएम रेडियो अब भी श्रोताओं को किसी हद तक बांधे हुए है। यदि रेडियो को भविष्य में और अधिक प्रासंगिक बनाना है, तो उसे अमेरिकी और ब्रिटिश रेडियो प्रसारण मॉडल से प्रेरणा लेनी होगी। संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में रेडियो ट्रैफिक के दौरान व्यापक रूप से सुना जाता है, क्योंकि यह एकमात्र ऐसा माध्यम है जिसे ड्राइविंग करते हुए सुरक्षित रूप से सुना जा सकता है।
भारत में भी ट्रैफिक को रेडियो का सबसे बड़ा लक्षित श्रोता वर्ग बनाया जा सकता है। सड़क परिवहन मंत्रालय के अनुसार, देश में करीब सात करोड़ कारें पंजीकृत हैं और भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार बाजार है। अनुमान है कि लगभग दो करोड़ कारें प्रतिदिन सड़कों पर रहती हैं, जो व्यस्त समय में और बढ़ जाती हैं। इसके अलावा ट्रक और बस चालक भी रेडियो के संभावित बड़े श्रोता हो सकते हैं।
इसके लिए जरूरी है कि ट्रैफिक अपडेट, सड़क सुरक्षा, मौसम, हल्का मनोरंजन और उपयोगी सूचनाओं पर आधारित विशेष रेडियो कार्यक्रम तैयार किए जाएं।
कुल मिलाकर, रेडियो का भविष्य उसकी अनुकूलन क्षमता पर निर्भर करता है। यदि वह तकनीक, स्थानीयता और श्रोताओं की बदलती जरूरतों के साथ कदमताल करता रहा, तो यह सबसे पुराना संचार माध्यम होने के बावजूद आने वाले समय में भी अपनी आवाज़ कायम रखेगा।
